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सबकुछ साफ़ हो जाए अगर छिपे वेरिएबल सामने आ जाएं

अगर ये जान जाएंगे तो कई तरह के सामानों और सेवाओं के प्रति आपका रवैया बदल जाएगा

मान लीजिए आप एक एयर टिकट खरीदते हैं, जो ₹ 6,000 का है, इतने पैसों में एयरलाइंस आपको दिल्ली से मुंबई ले जाएगी। ये है एक बात जिसके लेन-देन की प्रकृति को आप बिल्कुल साफ़ तरह से समझते हैं। यानि आप एयरलाइंस को पैसे देते हैं, और एयरलाइंस उस पैसे का इस्तेमाल, आपको एक शहर से दूसरे में ले जाने के लिए करती है। अब इसे दूसरी तरह से देखते हैं। आप जब एयरपोर्ट जाते हैं तो भीतर जाने के लिए ₹300 देते हैं। साथ ही आप सरकार को फ़्यूल और जीएसटी के लिए, टैक्स के तौर पर अलग से ₹2,700 देते हैं। हालांकि एयरलाइंस का टिकट आपको सिर्फ़ ₹3,000 का पड़ता है। बुनियादी तौर पर इन दोनों बातों में कोई फ़र्क नहीं है।

मगर पहले आपके मन में इस लेन-देन की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। जबकि दूसरी तरह से देखने पर ये बात एकदम साफ़ हो जाती है कि एयरलाइंस जो - एयरक्राफ़्ट, पायलट, फ़्यूल, और दूसरे काम कर रही है, दरअसल वो ग़ज़ब का काम कर रही है, और आपके दिए हुए पैसे का ज़्यादातर हिस्सा तो कहीं और ही जा रहा है। असल में, एयरलाइंस दूसरी कई सेवाओं के लिए एक कलेक्शन एजेंट का काम कर रही है। पर सोचिए, अगर आप हर किसी को अलग से पैसे दे रहे होते, तो कई बातें आप बिल्कुल साफ़ तौर पर समझ पाते।

आइए इसी प्रिंसीपल को एक फ़ाइनेंशियल सर्विस पर लागू कर के देखते हैं। मान लीजिए, आप एक इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदते हैं, ये यूलिप, या कोई भी दूसरी आम पॉलिसी हो सकती है। इस पॉलिसी के लिए आप एक तय रकम देते हैं, और बदले में आपको लाइफ़-कवर के साथ, निवेश का फ़ायदा भविष्य में मिलता है। अब यहां ये पता करना काफ़ी मुश्किल हो सकता है कि इंश्योरेंस-सर्विस का कौन सा हिस्सा पूंजी निवेश के हिसाब से सही था, और कौन सा नहीं। मान लेते हैं कि जो पैसा आपने इस पॉलिसी के लिए दिया है, वो मोटे तौर पर चार अलग मद में जाता है। आपके कुछ पैसे का इस्तेमाल लाइफ़ कवर को फ़ंड करने के लिए किया जाता है। इसका एक हिस्सा निवेश में चला जाता है, जिसकी बढ़ी हुई वैल्यू का हिस्सा आप अंत में वापस पाएंगे। आपके पैसे का कुछ हिस्सा एजेंट का कमीशन होता है, और कुछ पैसे को इंश्योरेंस कंपनी अपने पास रखती है, अपने खर्च और मुनाफ़े के तौर पर।

मान लीजिए, आप को इन सभी चीज़ों के लिए अलग-अलग बिल दिया जाए। यानि हर साल, आप एक ही मद में ₹2 लाख देने के बजाए, इन चारों खर्चों के लिए अलग-अलग पैसे दें। अगर ऐसा होता तो मैं समझता हूं कि ये आपको इंश्योरेंस प्रॉडक्ट्स का एक ज़्यादा समझदार खरीदार बना देता, और आपको कुछ भी बेचने के लिए इंश्योरेंस कंपनियों, और एजेंट्स को कहीं ज़्यादा मशक्कत करनी पड़ती।

अब म्यूचुअल फ़ंड को ही लें। इनमें पैसे को मैनेज करने के खर्च के तौर पर, आपसे एक तय रकम ली जाती है। ये रकम आपके निवेश की कुल रकम का कुछ भाग होता है, आमतौर पर इसका प्रतिशत, ज़ीरो से लेकर 2.5 तक हो सकता है। ज़ाहिर है जिन इक्विटी फ़ंड्स को एक्टिव तरीके से मैनेज किया जाता है, उनमें आपसे ज़्यादा पैसा लिया जाता है। अब अगर आप जानना चाहते हैं कि आप कितनी फ़ीस म्यूचुअल फ़ंड कंपनी को अपना पैसा मैनेज करने के लिए दे रहे हैं, और क्या ये रकम दिया जाना सही है, तो इसका जवाब तभी पाया जा सकता है जब या तो आप उनके भेजे सारे दस्तावेज़ों को बारीकी से पढ़ें और समझें, या आपका माइंडसेट रिसर्च का हो, और आपने वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन पर इस विषय के बारे में जानकारी हासिल करने में कुछ वक्त गुज़ारा हो।

मगर ये खर्च आपको आसानी से नज़र इसलिए नहीं आते क्योंकि ये आपके एनएवी से हर रोज़, बहुत थोड़ा-थोड़ा कर लिए जाते हैं। यही वजह है कि ये आपके लिए अदृश्य बने रहते हैं। मान लीजिए कि इसके नियम अलग होते। ये भी मान लीजिए कि आपका एनएवी, आपके निवेश की असल वैल्यू को दिखाता, और फ़ंड कंपनी हर क्वार्टर में आपसे फ़ंड मैनेजमेंट के खर्च के लिए पैसे लेती। मैं जानता हूं कि ये सब कुछ मानना बड़ा मुश्किल है, मगर क्योंकि ये विचारों का एक प्रयोग है, इसलिए कुछ देर और हम ये बातें मानना जारी रखते हैं। तो हमने ये मान लिया कि हर खर्च का अलग से पैसा देना है। अब इसके लिए आपको हर क्वार्टर में कुछ इस तरह से सोचना पड़ता: इस फ़ंड में मेरे ₹10 लाख लगे हैं। जिसपर फ़ंड से ₹30,000 का रिटर्न मिला है, और अब उन्होंने मुझे ₹5,000 हज़ार का बिल भेजा है। तो इसका मतलब हुआ कि मुझे रिटर्न का छठा भाग वापस करना होगा। यानि ₹30,000 बनाने के लिए वो मुझसे ₹5,000 चार्ज कर रहे हैं। नोट करें कि ये सभी नंबर वास्तविकता के काफ़ी करीब हैं; सच तो ये है कि ये नंबर सकारात्मक नज़रिए से लिए गए हैं। क्योंकि कुछ ऐसे क्वार्टर भी आएंगे जब फ़ंड कंपनी आपके पैसों से लाभ कमाने के बजाए, कुछ पैसे गंवाएगी, और उसके बाद भी आपको उस ‘सर्विस’ का बिल भेजेगी।

सोचिए अगर सच में ऐसा हो कि आप तो अपने मन में ये सारे खर्च फ़ायदे के प्रतिशत के तौर पर जोड़ें, जबकि फ़ाइनेंशियल इंडस्ट्री आपके पूरे पैसे पर चार्ज करे। और ये चार्ज आपकी पूंजी के उस हिस्से के लिए भी हो जो हमेशा से आपका ही था।

इस कॉलम के लिए मैं अपना कोई नज़रिया पेश नहीं करूंगा। जो कुछ भी मैंने लिखा है, उसे यहीं रोक कर आपके इस बारे में सोचने का इंतज़ार करूंगा। एक बार मैं ये पूरी तरह से समझ जाऊं कि आप लोगों का इस बात पर क्या कहना है, उसके बाद एक-दो हफ़्तों में मैं वापस इस टॉपिक पर लौट कर आऊंगा।